क्या मिला इस जीवन में
जीवन के इस भाग दौड़ में आखिर क्या हासिल कर पाया, पीछे मुड़ कर देखता हूं तो लगता है जैसे खोने के सिवा कुछ नहीं मिला,
प्रतिस्पर्धा और झूठे शान में असल जीवन का आनंद खो सा गया, कहने को बड़ा घर है, गाडियां है, बच्चे अच्छे कॉलेज में अध्यन कर रहे है, पत्नी के पास जेवर साड़िया इत्यादि सारी सुख सुविधा हासिल करते करते उम्र के उस पड़ाव पर आ गया जहां से पीछे देखने पर आंसुओ के सिवा कुछ नहीं मिलता दिखाई देता है, क्या यही जीवन है क्या इसी लिए हम इस संसार में आए थे, क्या यही जीवन का सुख है,
क्या एक दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में अपनी जिंदगी के सारे आनंद से वंचित हो जाना ही जीवन है, कैसी प्रकृति हो गई है मनुष्य की,
आइए इसी पर चर्चा करते है, जब हम छोटे थे कितना सुख था किसी से कोई मतलब नहीं था, कौन आगे जा रहा है, हम किससे पीछे होते जा रहे है, कोई मतलब नहीं था घर में जो भी रूखी सूखी रहता था खा कर चैन की नीद 8 से 10 घंटे लगा लेते थे, फिर धीरे धीरे हम बड़े होते गए तभी से हमे एक झूठी दिखावे की दुनिया दिखाई जाने लगी,हम बचपन को खोते गए और कब लोगो से प्रतिस्पर्धा हो गई पता ही नहीं चला,पढ़ाई पूरी करने के बाद परिवार की जिम्मेदारी डाल दी गई, खाना कभी समय से मिला कभी नहीं मिला, पूरी नीद कभी नहीं आई, सोते जागते बस वर्तमान की चिंताओं में खोते गए, ना कभी बच्चो को समय दे पाया ना कभी पत्नी को ना कभी खुद को , बस एक धुन सी सवार हो गई थी एक काम पूरा हुआ नही की दूसरे की जिम्मेदारी कब लेता गया पता ही नही चला,
आज जब आनन्द के सभी साधन इकट्ठा कर लिया तो शरीर अब उसे भोगने को तैयार नहीं है, कब उच्च रक्तचाप की बीमारी धीरे से शरीर में प्रवेश कर गई पता ही नही चला, डॉक्टर ने कहा है की वसा युक्त भोजन ना करूं, डॉक्टर उन सभी चीजों को खाने से मना कर दिया जो मुझे अत्यधिक प्रिय थे, इतने पर भी ये धन इक्ट्ठा करने की हवस ने साथ नहीं छोड़ा,
अब मधुमेह (शुगर) ने भी मेरे शरीर को दीमक की तरह अंदर ही अंदर खोखला करना शुरू कर दिया, रही सही खाने की चीजों को डॉक्टर ने उसे भी मना कर दिया
आज उम्र 40 , 45 की होने को आई शरीर साथ छोड़ रहा है, बच्चे मेरे ही नक्शे कदम पर अग्रसर हो रहे है,
फिर वही सोचता हूं क्या यही जीवन है क्या इसी को सुख भोगना कहते है, क्यू करते है हम ऐसे जीवन की शुरुआत जिसका मध्य अंत दुखो से भरा पड़ा है, आखिर कब जिया मैंने अपनी जिंदगी को, और किसके लिए अपने जीवन के उन आनंदित पलो का कत्ल कर दिया मैंने, क्या बड़ा सा घर बना लेना सुख है, क्या बड़ी सी रकम बैंक में भर देना सुख है, बड़ी महंगी गाड़ी खरीद लेना सुख है, क्या महंगे ब्रांडेड कपड़े पहन लेना सुख है, या आप का नाम समाज में ऊंचा हो गया है वो सुख है, लोग आप को झुक झुक कर प्रणाम कर रहे है वो सुख है,अगर यही सुख है तो यकीन मानिए आप भी मेरी तरह अपने वास्तविक सुख से वंचित होते जा रहे है,
मुझे नहीं लगता की यह वह सुख है जिसकी आप को जरूरत थी, वास्तविक सूख तो वो है जिसमे कोई दिखावा न हो कोई बनावटीपन ना हो, रोग रहित जीवन हो मन के मुताबिक आप का जीवन साथी हो जो आप के हर पल आप के साथ हो जिसमे कुछ भी खोने का डर ना हो आप के कच्चे घर के सामने कोई बड़ा सा पक्का मकान भी बना ले तो आप को उसकी कोई फिकर ना हो शाम का भोजन करने के पश्चात सुबह का इंतजाम हो इससे ज्यादा ना हो , कोई कर्ज न कोई लालच न हो, आप को इस झूठे संसार में कोई जाने या ना जाने आप के बच्चे आप की पत्नी जाने उतना ही बहुत है , झूठी इज्जत का ढोंग न हो, इज्जत गई की आई इसकी कोई आस ना हो,
कल्पना कीजिए पूरा परिवार चिंता मुक्त होकर एक साथ रूखी सूखी जो हो उसे खा रहे हो ना चोरी का भय ना दिखावे का ढोंग, चिंता मुक्त जीवन कोई बीमारी नहीं , दरवाजा बंद है या खुला चोरी की कोई चिंता नहीं, निरोगी काया
जब आप झूठे संसाधनों के पीछे नहीं दौड़ोगे निश्चित ही निरोग रहोगे, सब कुछ जुटा लेने के पश्चात अगर शरीर या मन रोगी हो गया तो जीवन गया व्यर्थ, और यकीन मानिए 100 में से 95 बीमारी से ग्रसित असल आनंद से वंचित हो कर अपने ही जीवन को जल्दी से नष्ट करने की दौड़ में सबसे आगे निकल जाना चाहते है,,,,,
🖋️ राजमणि भारती

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