अल्हड़ मस्त जिन्दगी ना किसी के रूठने का गम ना कुछ टूटने की चिन्ता,ऐसा लगता है जैसे सारा संसार अपना है,थोड़ी सी खुशियां भी खुश होने के लिए पर्याप्त होती थी,



मिट्टी से रिश्ता ऐसा जैसे मां का आंचल हो,कीचड़ से सने हाथ और उन्ही कीचड़ से सने हाथो से कुछ उठा कर खा लेना, आज के नाना प्रकार के व्यंजनों में भी अब वो स्वाद नहीं आता |

जरा सा रोता नही था की दौड़ कर मां गोद में उठा कर पुचकराने लगती थी,घुटनों पर चलते चलते आज अपने पैरो पर पहली बार खड़ा होने की कोसिश कर रहा था, 

पहला प्रयास असफल रहा लेकिन प्रयास निरंतर करता रहा,दो तीन दिनों में चलना आ गया,अब तो मुझे पकड़ने वालो को मैं थका देता था, मां थक जाती थी मगर फिर भी मेरे पीछे दौड़ा करती थी, जरा सा अपने आंखों से ओझल नहीं होने देती थी,,

पिता जी जब भी बाहर से आते मुझे गोद में उठा लेते थे,और मुझे बड़ी बड़ी बाते बताते,उन्हे ये लगता था की वो मुझे वो सब कुछ सिखा दें जो उन्होंने अपने जीवन काल में अनुभव किया है,जब वो मुझे बताते तो मैं बड़े गौर से उनकी बाते सुनता मगर शब्दो के उच्चारण का बोध ना होने के कारण, मैं उन्हें उत्तर देने के बजाय मुस्करा देता था, शाम को वो मुझे अपने पास लेटा कर नैतिक शिक्षा की कहानियां बताया करते थे,,



कभी कभी मैं उनके गोद से उतरने की जिद्द करता था,और जब वो उतार देते तो मैं मिट्टी में जाकर बैठ जाता और खुद को लपेटते हुए खेलना शुरू कर देता, जब मेरे तरफ आते तो खिलखिला कर हंसते  हुए दौड़ लगा देता,एकबार मैं इसी तरह भाग रहा था की अचानक से गिर गया और मेरे घुटने में खरोच आ गया ,

कुछ खून की बूंदे बार आ गई फिर क्या था मां ने पिता जी को ही डाट लगाने लगी , दोनो की आपस की नोक झोंक देख कर मैं चुपचाप सुनने लगता , पिता जी बार बार सफाई देते की वो खुद दौड़ रहा था मैं तो उसे पकड़ने जा रहा था की अचानक से वो गिर गया,दोनो को देख कर जैसे ही मैं मुस्कराया मां दौड़ कर आती और मुझे गोद में उठा लेती,समय चक्र तेजी से बदल रहा था |


बचपन धीरे धीरे मां के आंचल से निकल कर अब बच्चो के साथ खेलने में गुजरने लगा,दिन दिन भर ना खाने की चिंता ना नहाने की अब कभी कभी मां गुस्से में एक दो थप्पड़ लगा भी देती है,

मगर उसकी चिंताएं मेरे प्रति अभी भी कम नही होती, उसका प्यार आज भी मेरे लिए बहुत ज्यादा है,मैं अब बहुत शरारती हो गया था आए दिन किसी ना किसी से झगड़ा कर लेता था कभी कभी अपने उम्र के बच्चो से भिड़ जाता तो उन्हे मार पीट भी देता था, तब घर पर दूसरे बच्चो की माताएं उलाहना भी ले कर आती थी,

मां हमेशा दूसरों से मेरे लिए लड़ जाती, बहुत प्यार करती थी, उसे पूरा विश्वास था की मैं कभी किसी से पहले झगड़ा नहीं कर सकता,,,यह बात भी सत्य था मां ने बताया था की कभी किसी को गाली मत देना और जो गाली दे तो उसे समझाया करना की गाली नहीं देना चाहिए ,,,बस फिर क्या जब कोई मुझे गाली वाली देता तो मैं उसे ये बताता की ऐसा नहीं करना चाहिए, इसी बात को लेकर वो मुझसे उलझ जाते तो फिर क्या था, लड़ाई हो जाती,

वैसे तो मां हमेशा मेरे लिए कुछ ना कुछ खिलाती पिलाती रहती थी मगर जब तक मां के हिस्से से खा ना लूं मन ही नही भरता था,

खाना चाहे जितना खाए हुए क्यूं ना रहूं जब तक मां के थाली में नही खाता मेरा मन ही नही भरता था, छोटे छोटे शौख थे ,छोटा सा गुल्लख था, हम उसमे अपनी पॉकेट मनी को बचा कर रखते थे, गांव के दशहरा के मेला के लिए ,वैसे मेला के लिए 10 ,5 रुपए मिला करते थे, मगर कम पड़ जाते थे ,इसी लिए हम अपनी पॉकेट मनी को बचाते थे,फिर मेला में जाके खूब सरा मस्ती करते थे, खुला झूलते और खिलौने लाते, कुछ लूं या ना लूं बांसुरी जरूर लाता ,

और रास्ते से ही बजाते हुए आता घर में जब तक एकाक बार डाट ना पड़ती तब तक बजा बजा कर सब को परेशान कर देता था, चिंताओं से मुक्त बचपन ना कपड़ो की चिंता ना जूतों की ना भविष्य की चिंता ना वर्तमान की बस अपनी ही दुनिया में मस्त रहता था,

धीरे धीरे कब बचपन स्कूल के किताबो के नीचे दब गया पता ही नही चला,कल तक मस्त रहने वाला अब होमवर्क के पीछे परेशान, अगर नम्बर कम आए तो मां बाप की इज्जत जायेगी, स्कूल में पीछे के ब्रेंच पर बैठा दिया जाऊंगा,केवल पढ़ाई पर ध्यान धीरे धीरे बचपन जाता रहा, एक दिन ऐसा आया की दूसरे के बचपन को देख कर अपना बचपन याद आने लगा, जिम्मेदारियों के बोझ ऐसे हुए की यह एक सपना सा लगने लगा



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🖋️राजमणि भारती