पूरे मुहल्ले में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी एक नारायण चच्चा के यहां थी,
दूरदर्शन पर 7 बजे रंगोली आती थी,आखिरी के तीन गाने उस दौर के अर्थात नए आते थे, बाकी का पूरा रंगोली पुराने गानो का था,
सुबह 8 बजे से ही भीड़ इकट्ठा होने लगता था ,9 बजे तो मत पूछिए ऐसा लगता था जैसे नारायण चच्चा के यहां कोई उत्सव हों,जैसे ही टीवी पर प्रसारन शुरू होता बाजार बंद हो जाते ,रास्ते रुक जाते हो जैसे चारो तरफ शांति छा जाती थी,
और अपने मुहल्ले में तो मातम छा जाता था,लोग पसीना से तरबतर हो जाते मगर मजाल है की कोई पलक झपकाने तक के लिए भी टस से मस हो,
जानते है क्यों क्योंकि तब उस दौर का सबसे चर्चित रामानंद सागर निर्मित रामायण का प्रसारण होता था,
तब लाइट की सप्लाई इतनी सुचारू रूप से नही हुआ करती थी,
रविवार को तो हरगिज नहीं आती थी,
लोग बैटरी रखते थे 12 बोल्ट की बैटरी और ब्लैक एंड व्हाइट टीवी का दौर था,अगर किसी को कलर देखने की इच्छा होती तो रंग बिरंगी पन्नियो को टीवी के कांच पर लगा कर कलर का आनंद ले लेते थे,
तो रामायण का प्रसारण सुबह 9 बजे हुआ करता था,चच्चा के घर महफिल 8 बजे से ही सजने लगती थी,
हम छोटे बच्चे हुआ करते थे,इधर उधर घूमते रहते,
मुहल्ले के कुछ होशियार और सम्मानितो के लिए कुर्सियां रखी जाती थी,
जैसे ही रामायण का प्रसारण प्रारंभ होता शांति की लहर पूरे कोठरी में छा जाता है,
पूरा इंट्रो शांति से देखने का रिवाज था,प्रसारण के बीच में अगर किसी ने बोला तो पीछे से एक रौबदार आवाज आती ,
"ऐ कौन है जो चिल्ला रहा है ज्यादा चिल्लाओगे तो कान पकड़ कर बाहर निकल दिए जाओगे"
पूरा माहौल शांत,
अच्छा इसी बीच कोई कोई खेला कर जाता था , बादशाही गैस प्रवाहित कर देता फिर क्या था नारायण चच्चा एक दम से आग बबूला हो जाते ,
कल से कोई नहीं आएगा ,
गालियां भी सुना देते
फिर रविवार आया बच्चे घूमने लगे चच्चा भी नेता बने घूम रहे है, ऐ चलो आज टीवी नही लगेगा,
खबर मुहल्ले में आग की तरह फैल गई आज नारायण चच्चा के यहां टीवी नही लगेगी
क्यों भाई
यार चच्चा की बैटरी चार्ज नहीं है ,बस अब क्या था निकल पड़ते हम लोग किसी दूसरे मुहल्ले में वहां जाते जाते ,प्रसारण शुरू हो चुका था ,एकदम शांति पसरा था ऐसा प्रतीत होता जैसे गांव में कोई गुजर गया है,
टीवी का वैल्यूम एकदम कम ताकि आवाज बाहर तक ना आए,
लेकिन हम भी क्या कम थे ,शिकारी जिस तरह शिकार को सूंघता है हम भी सूंघते सूंघते दरवाजे के पास खड़े हो जाते,
कान सटा देते पीछे और लोगो की लाइन लगी है
अपने पीछे कुछ अपने से बड़े भी खड़े है
हम धीरे से दरवाजा हिला देते की शायद किसी को तरस आ जाए और दरवाजा खोल दे,
मगर अंदर से आवाज आती ,
जगह नही है और दरवाजा मत पीटो नही तो पिटाई हो जायेगी
अभी भी आस ने साथ नहीं छोड़ा था,दरवाजे के पास अभी भी कान लगाए, खड़े हैं हम लोग,
आखिर एड ब्रेक हुआ कुछ लोग हल्का होने के लिए निकले ,
दरवाजा इतना ही खुलता है जितने में वो आदमी करवट हो कर निकल सके ,
बस दरवाजा क्या खुला अंदर जाने की जद्दोजहद शुरू हो जाती, बाहर से अंदर जाने वालो का अंदर प्रेशर बना रहे है अंदर वाले गालियां देते हुए दरवाजे को फिर से बंद करने की कोशिश कर रहे थे की इसी बीच मुझे अंदर जाने का मौका मिल गया,
आज का तो काम बन गया,मेरे साथ के मित्र बाहर अभी भी दूसरे एड ब्रेक का इंतजार में खड़े थे,
सीरियल के खतम होते सभी बाहर निकल रहे थे अभी हमारे साथ कुछ बच्चे बैठे है,क्योंकि अब चार्ली चैपलिन का शो शुरू होने वाला था,
मगर टीवी बंद कर दिया जाता था,
और अपराधबोध सा मन में लिए कोठरी से बाहर आ जाते।
नारायण चच्चा के यहां एक टीवी ने ऐसा माहौल बनाया की धीरे धीरे मुहल्ले में कई लोगो ने टीवी खरीद लिया ।
मगर देखने वालो का प्रेशर खतम नही होता,
जब तक रामायण का प्रसारण होता रहा देखने वालो की चाहत बनी रही ,
आज भी रामायण को हम उसी चाव से देखते है,
आज की पीढ़ी भले ही रामायण के नए नए वर्जन बना कर VFX के द्वारा नए उत्साह भरने की कोशिश करे,
रामानन्द जी की तरह नहीं बन पाती है, और बना भी नही पाएंगे,क्योंकि आज की पीढ़ी अपने आप को पूर्ण रूप से कंप्यूटर के ऊपर निर्भर कर रखा है,
हमे कुछ भी जानना होता है हम गूगल की ओर रुख करते है,
हमने अपने दिमाग में फालतू के चीजों को भंडारण कर लिया है,
रामानन्द जी के द्वारा रचित धारावाहिक ने
रामायण के एक एक पात्र को हर जनमानस के हृदय में जीवंत स्थापित कर दिया,
रामानंद जी ने रामायण के सभी किरदारों को समाज के उन लोगो तक पहुंचा दिया शायद जिन्हें रामचरित के बारे में ही ज्ञात न रहा हो,
अमर टीवी सीरियल बना कर रामानंद जी ने कई कलाकारों को लोगो के बीच स्थापित किया है,,
खैर इस विषय पर फिर कभी चर्चा होगी,
आप सभी पाठको से निवेदन है की आप मेरे लेख को पढ़ने के बाद इस पर अपनी राय अवश्य दे,
इससे मुझे मेरे लेख में हुए त्रुटियों को सुधार कर आप सभी के लिए रोचक बनाने का अवसर मिलेगा,
जय श्री राम
🖋️ राजमणि भारती
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