तेरी चाहत


तेरी चाहत दीवाना बना रही है,
तू दूर बहुत है तेरी याद तड़पा रही है
तू मेरे मुहब्बत की सीढ़ियों से मंज़िल को पा रही है
मुझे वो तेरी मुहब्बत खाक-ए-गुल मिटा रही है,

लिखने का शालिका सिखाता रहा मै तुझे 
तूने ख़त भी लिखा तो किसी और के लिए
क्या मेरे मोहब्बत का इम्तहान हो रहा है
या तू बेक़रार है किसी और के लिए,

रात ढलती जा रही है,शम्मा पिघलती जा रही है
तेरे इश्क़ की हरारत में जान ज़लती जा रही है
तू जितनी मगरूर है शान-ए-दौलत के गुरुर में
ये और बात है कि तू उतने मेरे रूह में बसती जा रही है,


गलतफहमियों का दौर चल रहा था कि सालो से
कल मुझे आईना दिख दिया उसने,
बहुत नाज़ था मुझे एतबार-ए-इकरार पर
मजमा-ए-कातिल से रूबरू कर दिया उसने
               🖋️ राजमणि भारती